अमीर ख़ुसरो की पहेलियाँ उत्तर सहित (अर्थ के साथ)

अमीर ख़ुसरो (1253–1325) कवि, संगीतकार और सूफ़ी संत हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के शिष्य थे। उन्हें हिंदवी (पुरानी हिंदी) का पहला बड़ा कवि माना जाता है। उनकी पहेलियाँ सात सौ साल बाद भी उतनी ही मज़ेदार हैं। यहाँ उनकी सबसे मशहूर पहेलियाँ और दो-सुख़ने उत्तर और अर्थ सहित दिए गए हैं।

नोट: ख़ुसरो की पहेलियाँ सदियों से ज़ुबानी चली आ रही हैं, इसलिए अलग-अलग किताबों में शब्दों में थोड़ा फ़र्क़ मिल सकता है।

विषय सूची

अमीर ख़ुसरो की मशहूर पहेलियाँ

1. एक थाल मोती से भरा, सबके सिर पर औंधा धरा।
चारों ओर वह थाली फिरे, मोती उससे एक न गिरे।

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आकाश (तारों भरा आसमान) – थाल आसमान है और मोती तारे।

2. तरवर से इक तिरिया उतरी, उसने बहुत रिझाया।
बाप का उससे नाम जो पूछा, आधा नाम बताया।
आधा नाम पिता पर प्यारा, बूझ पहेली मोरी।
अमीर ख़ुसरो यूँ कहे, अपना नाम नबोली।

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निंबोली (नीम का फल) – “नीम” का आधा “नि” और उसका अपना नाम “बोली”।

3. एक नार ने अचरज किया, साँप मार पिंजरे में दिया।
ज्यों-ज्यों साँप ताल को खाए, सूखे ताल साँप मर जाए।

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दीया और बाती – बाती (साँप) तेल (ताल) पीती है; तेल ख़त्म तो बाती बुझ जाती है।

4. बीसों का सिर काट लिया,
ना मारा ना ख़ून किया।

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नाख़ून – बीस उँगलियों के नाख़ून काटे, पर किसी को चोट नहीं।

5. श्याम बरन और दाँत अनेक, लचकत जैसे नारी।
दोनों हाथ से ख़ुसरो खींचे, और कहे तू आ री।

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आरी – लकड़ी काटने की आरी; “आ री” में ही उत्तर छिपा है।

6. आगे-आगे बहिना आई, पीछे-पीछे भइया।
दाँत निकाले बाबा आए, बुरक़ा ओढ़े मइया।

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भुट्टा – पहले रेशे (बहन), फिर डंठल, फिर दाने (दाँत) और छिलका (बुरक़ा)।

7. उज्ज्वल बरन अधीन तन, एक चित्त दो ध्यान।
देखत में तो साधु है, पर निपट पाप की खान।

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बगुला – सफ़ेद और ध्यान में खड़ा दिखता है, पर मछली पकड़ने की ताक में रहता है।

8. खेत में उपजे सब कोई खाय,
घर में होवे घर खा जाय।

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फूट – खेत में फूट (ककड़ी जैसा फल) सब खाते हैं, घर में फूट (झगड़ा) हो तो घर बर्बाद हो जाता है।

9. एक गुनी ने यह गुन कीना, हरियल पिंजरे में दे दीना।
देखो जादूगर का हाल, डाले हरा निकाले लाल।

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पान – हरा पान मुँह में जाता है और लाल रंग निकलता है।

10. फ़ारसी बोली आईना, तुर्की सोच न पाईना।
हिंदी बोलते आरसी आए, मुँह देखे जो इसे बताए।

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आईना / आरसी (दर्पण)

अमीर ख़ुसरो की पहेली: एक थाल मोती से भरा, सबके सिर पर औंधा धरा
अमीर ख़ुसरो की सबसे मशहूर पहेली – उत्तर ऊपर पहली पहेली में।

अमीर ख़ुसरो के दो-सुख़ने

दो-सुख़ना एक ख़ास पहेली है जिसमें दो सवाल होते हैं और दोनों का उत्तर एक ही होता है – पर हर सवाल में उसका मतलब अलग होता है।

11. पान सड़ा क्यों? घोड़ा अड़ा क्यों?

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फेरा न था – पान को पलटा (फेरा) नहीं गया, घोड़े को घुमाया (फेरा) नहीं गया।

12. अनार क्यों न चखा? वज़ीर क्यों न रखा?

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दाना न था – अनार में दाने नहीं थे, वज़ीर दाना (बुद्धिमान) नहीं था।

13. सितार क्यों न बजा? औरत क्यों न नहाई?

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परदा न था – सितार में परदे नहीं थे, नहाने के लिए परदा नहीं था।

14. गोश्त क्यों न खाया? डोम क्यों न गाया?

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गला न था – गोश्त गला (पका) नहीं था, गायक का गला ठीक नहीं था।

15. दीवार क्यों टूटी? राह क्यों लूटी?

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राज न था – दीवार बनाने वाला राज (मिस्त्री) नहीं था, देश में राज (शासन) नहीं था।

और पहेलियाँ

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

अमीर ख़ुसरो कौन थे?

अमीर ख़ुसरो (1253–1325) दिल्ली के कवि, संगीतकार और सूफ़ी संत निज़ामुद्दीन औलिया के शिष्य थे। उन्हें क़व्वाली का जनक और हिंदवी का पहला बड़ा कवि माना जाता है।

अमीर ख़ुसरो की सबसे मशहूर पहेली कौन सी है?

“एक थाल मोती से भरा, सबके सिर पर औंधा धरा” – इसका उत्तर है तारों भरा आकाश।

दो-सुख़ना क्या होता है?

दो-सुख़ना ऐसी पहेली है जिसमें दो सवालों का एक ही उत्तर होता है, जैसे “पान सड़ा क्यों? घोड़ा अड़ा क्यों?” – उत्तर: फेरा न था।

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